अपनी शिकस्त की आवाज़ मंटो


नंदिता दास अभिनय के साथ-साथ फिल्म-निर्देशन में भी बिलकुल अलग पायदान पर खड़ी हैं. फिल्म फ़िराक़नंदिता द्वारा निर्देशित उन एक-दो फ़िल्मों में से है जो गोधरा के बाद गुजरात में मुस्लिमों के भय,आशंकाओं और समाज में अलग-थलग कर दी गई क़ौम की कहानी कहती है. जिन लोगों ने फ़िल्म देखी है वे जानते हैं कि फ़िल्म बनाने का यह शायद नंदिता का अपना तरीक़ा है जहाँ वह एक केंद्रीय कहानी और पात्र को बीच में रखकर उसके पूरक के रूप में अन्य कहानियाँ भी कहती चलती हैं. उनके इस कहन के ढंग को हमने उनकी फ़िल्म फ़िराक़ में भी देखा था और बिलकुल यही अंदाज़े बयाँ हम उनकी नयी फ़िल्म मंटोमें भी देखते हैं. यहाँ उर्दू अदब के अज़ीम अफ़सानानिगार सादत हसन मंटो की ज़िंदगी ख़ुद एक कहानी है और वे स्वयं कहानी के पात्र और उनकी इस कहानी को मुकम्मल करती है उनकी ही लिखी चार कहानियाँ मसलन दस रूपए का नोट, सौ वाट का बल्ब, खोल दो, ठंडा गोश्त, टोबा टेक सिंह और उनके पात्र.
         फ़िल्म मंटोमें नंदिता ने बँटवारे के आस-पास के समय को जीवंत तो किया ही है साथ ही उन संकटों को भी बहुत ही सलाहियत के साथ कहानियों में गूँथ दिया है जिनसे हम आज भी वबस्ता हैं.यहीं फ़िल्म परोक्ष रूप से देश के हुक्मरानों और दर्शकों से सवाल कर जाती है कि मुल्क के ऊपर बोझ की तरह लाद दिए गए इन संकटों से निपटने की दिशा में हम कितना आगे बढ़े हैं. जो चुनौतियाँ आज़ादी के दौर में हमारे सामने दरपेश थीं वह आज मुल्क के लिए नासूर बन चुकी हैं. सोशल मीडिया  में ट्रोलिंग, लेखकों-बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ चलने वाले कुत्सित अभियान, मॉब लिंचिंग, बात-बात पर पाकिस्तान चले जाने के ताने,इन सभी परिस्थितियों ने जिस तरह आज चारों तरफ़ भय का वातावरण बनाया है यह भय और आशंका एक क़ौम के लिए आज़ादी और बंटवारे के दौर से ज्यादा लगातार गहरी होती गई है.
                                 
        यहाँ मंटो निमित्त मात्र की तरह हैं. जिनकी कहानी बंटवारे की भेंट चढ़ गए लाखों-करोड़ों की कहानी बन जाती है. मंटो जिन्हें अपने अज़ीज़ शहर बॉम्बे से इस क़दर लगाव है कि अपनी बहन से लाहौर बसने के सवाल पर वे कहते हैं कि  'मैं लाहौर एक ही शर्त पर आ सकता हूँ यदि बॉम्बे ख़ुद लाहौर आ जाये..लेकिन अपनी माटी, अपनी जड़ों, अपने पुरखों की क़ब्रें छोड़कर बँटवारे के दौरान बना दिए गए साम्प्रदायिक डर के माहौल, एक-दूसरे को लेकर मँडराते आशंकाओं के बादलों के बीच मंटो को बॉम्बे छोड़ना पड़ता है. वही बॉम्बे जहाँ मंटो के वालिद-वालिदा दफ़्न हैं, जिस बॉम्बे के बारे में मंटो कहते हैं मेरा सबकुछ वहीं तो है.
     एक तरफ़ मंटो की कहानियों का दृश्यांकन जहाँ उस दौर की अमानवीयताओं और भयावहताओं से दर्शकों का साक्षात्कार कराती चलती हैं वहीं फ़िल्म दूसरी तरफ़ मंटो के बहाने हिंदुस्तान की हिंदू-मुस्लिम दोनों कौमों के बीच सदियों से बनती गई आपसदारी का भी दीदार कराती जाती है. फ़िल्म में दो दृश्य हैं, बँटवारे के बाद हिंदू-मुस्लिमों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है ..मंटो(नवाज़ुद्दीन सिद्दकी) फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार के साथ कार में बैठकर कहीं जा रहे हैं, अशोक कुमार एक रास्ता लेते हैं जो शायद मुस्लिम बहुल है, मंटो घबरा जाते हैं और वे दहशत में आकर अशोक कुमार को मुस्लिम टोपी पहनाने लगते हैं, अशोक कुमार को देखकर कुछ मुस्लिम लड़के और नौजवान उन्हें सम्मान और ख़ुशी से सही रास्ता बताते हैं. एक ऐसे ही दृश्य में  जब मंटो लाहौर आ जाते हैं और एक हलवाई की दुकान में उन्हें महात्मा गांधी की हत्या का पता चलता है, मुस्लिम हलवाई गांधी की हत्या की खबर सुनाने वाले को उसके अन्दाज़ पर झिड़कते हुये कहता है मातम की ख़बर देने का सलीक़ा भी नहीं है..'  ये दोनों घटनाएँ दर्शकों को समझने में मदद करती हैं कि चाहे अशोक कुमार रहे हों या महात्मा गांधी ये शख़्सियतें हिंदू- मुस्लिम दोनों के लिए बराबर का दर्जा रखती रही हैं.
                                    
        फिल्म जहाँ एक तरफ बॉम्बे, फिल्म संसार, बंटवारे से उपजी पीड़ा, लाहौर की कहानी कहती है वहीँ बतौर लेखक मंटो को अपने अफसानों को लेकर जिन कानूनी और अदबी बहिष्कार के साथ प्रकाशकों की चालाकियों, निजी जिंदगी की परेशानियों से जूझना पड़ता है उसकी भी कहानी फ़िल्म कहती जाती है. लगातार बनी रहने वाली आर्थिक तंगी, अफ़सानों पर फ़ुहस का आरोप लगाकर किये जाने वाले मुकदमों के चलते कचहरियों के चक्कर और अपने ही साथियों की उपेक्षाओं से अकेले पड़ते जाने के बावजूद लेखक मंटो को अपना स्वाभिमान प्रिय है. वर्तमान के इस दौर में जब लेखक-साहित्यकार अपनी छोटी-छोटी जरूरतों को लेकर अपनी लेखकीय गरिमा से समझौता करने के लिए हर वक़्त तैयार खड़े रहते हैं, जब हिंदुत्ववादी ताकतों की आक्रामकता से समाज में अलग-अलग कौमों की आपसदारी से बनी संरचना पहले के बरक्स कहीं ज्यादा खतरे में हैं, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा पहरे हैं.बलात्कार, हिंसा , नफ़रत ने और ज्यादा अपने दायरे का विस्तार किया है तब फिल्म ‘मंटो’ जैसे पूर्व की गलतियों से सीखते हुए एक बार फिर दुश्चक्र में न फंसने की हिदायत बन जाती है.
     मंटो फिल्म सआदत हसन मंटो के जीवन के एक काल-खंड को, उस काल-खंड के भयों, संकटों, सवालों के माध्यम से वर्तमान के संकटों, सवालों और लगातार भयग्रस्त होते जा रहे वातावरण की छवि का अक्स पेश करती है. और इस काम के लिए सआदत हसन मंटो के लगभग सर्वज्ञात जीवन हिस्सों और उनकी बहुपठित और बहुचर्चित कहानियों को ही आधार बनाती है. फिल्म कुछ अतिरिक्त नहीं जोडती. फिल्म के ट्रीटमेंट से यह समझना कतई  मुश्किल नहीं रह जाता कि यहाँ फिल्मकार का मकसद ‘मंटों’ के पूरे जीवनवृत्त को सेल्यूलाइड में उतारने का नहीं है बल्कि लेखक मंटो के बहाने वर्तमान के संकटों से दर्शकों को जोड़ना है. इस कड़ी में हम फिल्म ‘घासीराम कोतवाल’ को याद कर सकते हैं. बेशक ‘घासीराम कोतवाल’ बिलकुल अलग विषय को उठाने वाली फिल्म है लेकिन अतीत के माध्यम से वर्तमान पर रौशनी डालने के सम्बन्ध में यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है. 'धर्म के सर चढ़कर बोलने ..' 'हिन्दू-मुस्लिम टोपियों ..' 'नाज़ के कातिलों द्वारा लहू और लोहे से तारीख लिखने..' के दौर में फिल्म 'मंटो' एक शाहकार की तरह याद रहेगी.

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