घटनाओं की अनिश्चतताओं से भरी 'अंधाधुन'

अंधाधुन पर बात करने से पहले श्रीराम राघवन से जुड़ी एक याद, वह यह कि साल 2015 के मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल मामी में महबूब स्टूडियो में मूवी मेला था और वहीं मास्टर क्लास, रियूनियन वग़ैरह भी आयोजित थे ..तब तक फ़िल्म बदलापुर रिलीज़ हो चुकी थी और चारो तरफ़ तारीफ़ हो रही थी ..ख़ैर मैंने उस दिन फ़िल्में देखने की जगह महबूब स्टूडियो जाना तय किया और एक अंधेरे हॉल में घुसकर अपने लिए बैठने की जगह तलाश कर था, एक ख़ाली कुर्सी दिखी जहाँ मैं जाकर बैठ गया ..बैठने के बाद थोड़ा आस-पास का जायज़ा लिया और देखता हूँ कि ‘बदलापुर’ के निर्देशक श्रीराम राघवन बिलकुल मेरी बग़ल वाली सीट में बैठे हैं, मैं सहसा विश्वास नहीं कर पाता कि हाल ही जिसने बदलापुर जैसी शानदार फ़िल्म दी हो उसका निर्देशक बिलकुल मेरी बग़ल में बैठा है और वो भी इतना निस्प्रभ और सहज ढंग से कि जिसे इस बात की बिलकुल चाहत नहीं की हॉल के अंदर बैठे हुए बड़ी तादाद में स्रोता उन्हें कोई अतिरिक्त अटेंशन दें..मैंने भी श्रीराम राघवन से बात नहीं की बस उनकी सहजता से उनके प्रति और सम्मान से भरकर उनकी बग़ल में बैठा रहा..आज 'अंधाधुन' देखकर इस शांत और सज्जन दिखने वाले निर्देशक के लिए सम्मान और बढ़ सा गया है. बहरहाल
अब बात ‘अंधाधुन’ की. आज के द हिंदू में नम्रता जोशी के साथ इंटर्व्यू में श्रीराम राघवन ने हिचकॉक की फ़िल्म ‘ब्लैकमेल’ के एक दृश्य का ज़िक्र किया है जिसमें एक महिला किसी को पिछली रात जिस चाक़ू से क़त्ल करती है..सुबह नाश्ते के समय कोई उस चाक़ू को ब्रेड काटने के लिए पास करने के लिए कहता है. और ठीक इसी दृश्य की सी सिहरन पैदा करने वाली आयरनी फ़िल्म में उस वक़्त दर्शक महसूस करते हैं जब एक अंधा पियानो वादक जो अंधा नहीं है(आप यह बिलकुल न सोचें की मैंने अंधेपन का राज खोलकर आपका मजा किरकिरा कर दिया..इतना हिंट तो ट्रेलर में ही था लेकिन आगे कहानी में ट्विस्ट है) बस अपनी कला की इन्सपिरेशन के लिए अंधा बनने का ढोंग कर रहा है अपने ही सामने लाश पड़े हुए देख रहा है ..लाश को ठिकाने लगाते हुए देख रहा है..लाश की कलाई से घड़ी और ऊँगली तोड़कर अँगूठी निकालते हुए देख रहा है..साथ ही लगातार पियानो भी बजा रहा है. इसके अलावा जिसके पति का क़त्ल हुआ है उसके द्वारा यह झूठ बोला जाना कि ‘उसके पति को जल्दी थी वह चले गए तुम्हारा कोई पेमेंट हो तो बताओ..’ ठीक यहीं पर इस किंचित लम्बे दृश्य में सिमी (तब्बू) जब आकाश (आयुष्मान खुराना) को उसकी पेमेंट के लिए पूछती है हिचकॉक की ब्लैकमेल के ऊपर वर्णित दृश्य में दर्शकों को जिस सिहरन का एहसास होता है ठीक वही एहसास यहाँ भी तारी हो जाता है.

श्रीराम राघवन वैसे तो हिचकॉक के मुरीद हैं. लेकिन उनकी फिल्मों में किसी घटना विशेष से रहस्य का पर्दा फिल्म के क्लाइमेक्स में नहीं खुलता बल्कि उनकी फिल्मों के चरित्र 'क्वेंटिन टरैन्टिनो' की फिल्मों के चरित्रों की तरह समय की परिस्थितियों में अटके हुए होते हैं जहाँ हर क्षण स्थितियां बदल जाती हैं. दर्शक ने अपने दिमाग में सम्बंधित दृश्य के सम्बन्ध में कुछ और निर्णय ले लिया है लेकिन वह अगले ही पल अपने सामने कुछ और घटित होते हुए देखता है. और 'अंधाधुन' में यही अनिश्चितता अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है जबकि निर्देशक ने फिल्म में अपराध और अपराधी को दर्शकों से छुपाया नहीं है. और न ही दर्शकों के सामने किसी जासूस या पुलिस द्वारा किसी रहस्योद्घाटन की कोई गुंजाइश रखी है बल्कि दर्शक किसी दृश्य के परिणाम को छोड़कर प्रत्येक सच्चाई के चस्म्दीद हैं.
'अँधाधुन' हिंदी फिल्मों में थ्रिलर जॉनर में एक मुकाम है और यह हर तरह के जॉनर में हिंदी सिनेमा में आ रहे बदलाव की एक कड़ी है. जाहिर है अभी कथानक की मौलिकता, दृश्यों के रचना और डायलॉग तक अभी लम्बा सफ़र तय करना है. फिल्म में एक दो दृश्य ऐसे हैं जिनका दर्शक आसानी से पूर्वानुमान कर सकते हैं. 'शशांक रिडेम्पशन' ,'सेवेन' और 'साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब्स' जैसी फ़िल्में याद आती हैं जहाँ दर्शक एक-एक डायलॉग और दृश्यों की रोमांचकता से अवाक् रह जाता है. 'अँधाधुन' एक फ्रेंच शॉर्ट फिल्म 'द पियानो ट्यूनर' की थीम पर आधारित है जिसे फिल्म के अंत में बताया गया है इसके बावजूद फिल्म 'अँधाधुन' में कहानी का विस्तार, घटनाएँ और आपस में जुड़े तार दर्शकों को गुदगुदाते हैं, चमत्कृत करते हैं, रोमांचित करते हैं और आगे होने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने के लिए उकसाते हैं. आखिर में फ़िल्में देखते हुए ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि दर्शक फिल्म के अंत में तालियाँ बजाकर सराहना करे लेकिन फिल्म के अंत में हॉल में दर्शक तालियाँ बजाने से रोक नहीं पाते.

Comments

Popular posts from this blog

हमारे समय की डिस्टोपिया है न्यूटन

गुलाबो सिताबो: कम बची रह गई जगहों और किरदारों की कहानी