हमारे समय की डिस्टोपिया है न्यूटन
अगर तुम जनता को सच्चाई
बताना चाहते हो तो उन्हें हंसाओ अन्यथा वे तुम्हें मार डालेंगे-ऑस्कर वाइल्ड
जैसे आर्थिक मंदी के दौर में मार्क्स की ‘दास
कैपिटल’ की बिक्री संसार भर में बढ़ गई थी वैसे ही सुनते हैं की अमेरिका में
‘ट्रम्प’ के राष्ट्रपति बनने के बाद ‘डिस्टोपियन’ साहित्य की मांग बढ़ गई है और एक
बार फिर से वहां के लोग ‘जॉर्ज ऑरवेल’ के उपन्यास ‘1984’, ‘एनिमल फॉर्म’ और
‘मार्गरेट ऐटवुड’ की ‘द हैण्डमेड’स टेल’ जैसी कृतियाँ ढूंढ़कर पढ़ रहे हैं. जब देश
में मूलभूत सुविधाओं मसलन स्वास्थ्य,शिक्षा,घर,सड़क,रोजगार,बिजली पानी,इत्यादि की
मांग करने वालों व आदिवासी प्रश्नों व विस्थापनों, बढ़ते अपराधों,
साम्प्रदायिकता,आर्थिक बर्बादी के खिलाफ बोलने वालों को नकारात्मक सोच वाला बताकर
उनका मजाक बनाते हुए उन्हें ‘विकास’ विरोधी साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं(
यहीं फिल्म का केन्द्रीय पात्र ‘न्यूटन’
इन सबका सामूहिक रूप से प्रतिनिधित्व करने वाला चरित्र बन जाता है) और महज एक निजाम,
एक धर्म, एक विचार को चौतरफा सार्वभौम सत्य की तरह स्थापित किया जा रहा है तब
फिल्म ‘न्यूटन’ जैसे एक ‘डिस्टोपियन’ की तरह अँधेरे के पार दिखने वाली सच्चाई को दिखाने चली आई हो. खतरा इतना ज्यादा है कि
सीधे नाम नहीं लिया जा सकता, स्पष्ट तौर पर समस्याओं को संबोधित नहीं किया जा
सकता..हर दृश्य हर चरित्र सचेत और चौकन्ना है..दर्शकों को चल रही कहानी की सचाई
जानने के लिए ‘न्यूटन’ की तरह ही अपने ‘सेन्स’ का इस्तेमाल करना है वरना शायद
संकेतों और चरित्रों में छुपे मंतव्य छूटते चले जाएँ..
दो हजार चौदह के पहले के राजनीतिक परिदृश्य
को याद करेंगे तो पायेंगे की राजनीतिक विमर्श कुछ और होते थे. उस दौर में चलने
वाले विमर्शों में आदिवासी, जल-जंगल-जमीन की लूट, कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण,
कृषि संकट, शिक्षा, बेरोजगारी के सवाल बहसों के केंद्र में हुआ करते थे.देश के
केन्द्रीय शासन में परिवर्तन हुआ और
विकास,स्वच्छ-भारत,स्मार्ट-सिटी,मेक-इन-इण्डिया,स्किल-इण्डिया,जन-धन
खाता,काला-धन,पंद्रह-लाख के नारों के साथ नए निजाम की ताजपोशी हुई.लेकिन उसके बाद
जो हुआ उसके हम आप सब गवाह हैं की कैसे इन नारों को ‘जुमला’ इनायत किया गया और देश
को राष्ट्रवाद,वन्दे-मातरम्,गौ-हत्या,बीफ,तिरंगे-झंडे,की बहसों में चालाक इरादों
के साथ उलझा दिया गया.और हम पाते हैं की बहसों के केंद्र में जिन विषयों को होना
चाहिए था वे विषय धीरे-धीरे हमारी-आपकी बात-चीत से, टीवी के प्राइम-टाइमों से,
अख़बारों-पत्रिकाओं से सिरे से गायब होते चले गए. हम और आप नोटबंदी व जीएसटी में
उलझा दिए गए.जब हम पूँजीवाद के साथ फासीवाद के गठजोड़ के खतरों की बात करते हैं
क्या यही वो खतरे नहीं हैं कि हमारे देश में जो खनिज-संसाधनों की पूंजीवादी लूट है
उन्हें ख़बरों व विमर्शों के हाशिये में धकेल दिया गया व आधारहीन विषयों को बहसों
के केंद्र में खड़ा कर दिया गया. पिछले बीते दिनों में कितना कोयला, कितना अभ्रक,
कितना युरेनियम इस देश में वारा-न्यारा कर दिया गया,कितने आदिवासियों को अपने घर
छोड़कर विस्थापित होना पड़ा. हो सकता है कभी अध्ययनों से इसका हिसाब मिले..
यह अनायास नहीं है कि फिल्म का कथानक आम-चुनावों
में वोटिंग के बहाने दंड्यकारंण्य के जंगलों के आदिवासियों को लेकर बुना गया है.
फिल्म के कथानक की यह बुनावट दो काम एक साथ करती है एक तो बहसों का जो पैराडाइम
शिफ्ट है उसे फिर बहस के केंद्र में ले आना और दूसरा आदिवासी इलाकों में जिस
नक्सलवाद का खौफ व दुष्प्रचार जिसतरह आम जन-मानस के बीच पैदा किया गया है उसकी
सच्चाई को सामने लाना..आदिवासी क्षेत्र में वोटिंग कराने के लिए भेजे गए अपने
साथियों के साथ ‘न्यूटन’ बूथ-स्थल तक जाने के लिए पैरा मिलिट्री फ़ोर्स के अफसर को
बुलाता है तो वह खतरे की बात कहकर जाना टालने की कोशिश करता है और कहता है कि
‘हमारे आदमी जाकर वोट ले आयेंगे..’ आदिवासियों के वोट के प्रति मिलट्री अफसर की
अनिच्छा बार-बार दिखती है.रास्ते में मिले कुछ आदिवासियों को वह वोटिंग समय गलत
बताकर उन्हें गुमराह करवाने की कोशिश करता है..लेकिन स्थानीय ‘मलको’ के हस्तक्षेप
से उन्हें सही समय बताया जाता है..बूथ लगने के बाद काफी समय होने के बावजूद जब कोई
वोट डालने नहीं आता तब भी मिलट्री अफसर ‘न्यूटन’ की वोट डलवाने के लिए तय समय तक
बूथ पर रहने के अहमकपना पर तंज कसता है..फिल्म में इसका कारण साफ़ तौर पर समझ नहीं
आता की आदिवासियों के वोटों के प्रति मिलट्री अफसर की अनिच्छा की वजह क्या है? न
ही यह साफ़ होता की चुनाव प्रचार के बाद घर लौट रहे नेता की हत्या जंगल में जिस
नकाबपोश ने की वह कौन था? क्या सच वह नक्सली ही था? न यह साफ़ होता है कि आदिवासियों
के जिसने घर जलाये क्या वह नक्सली ही थे?
इसका बहुत कुछ जवाब हमें माहौल में पसरी संदिग्धता और ‘मलको’(अंजलि पाटिल) के
सांकेतिक संवादों से आभास के रूप में मिलता है..मसलन ‘मैं यहीं कि हूँ मुझे बुलेट प्रूफ में
ज्यादा खतरा है..’ ‘मैं निराशावादी नहीं,आदिवासी हूँ’..’सालों लग जाते हैं जंगल
बनने में’..
ये संवाद उन सच्चाइयों की
और इशारा हैं जिसे राष्ट्र-राज्य की समूची मशीनरी राष्ट्र की मुख्य धारा से छुपाये
हुए है..फिल्म में ही एक दृश्य है जब ‘न्यूटन’ विदेशी पत्रकार के साथ आये हुए
पुलिस अफसर से वोटिंग में सहयोग न करने की बाबत वहां मौजूद मिलट्री अफसर की शिकायत
करना चाहता है तो पुलिस अफसर कहता है कि ‘यदि यहाँ बूथ कैप्चरिंग नहीं हुई देन
एवरीथिंग इज फाइन’..जैसे दंड्यकारण्य में जो भी हो रहा है उसकी सच्चाई राज्य के
नुमाइंदों को पता है लेकिन बांकी संसार के लिए अगर कोई सच्चाई है तो वो दुनिया के
सबसे बड़े लोकतंत्र में दुर्गम जंगली और पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासियों का महज वोट
ले लेना है.जिसे आजकल इस रूप में चिन्हित किया जाता है कि भारत का लोकतंत्र महज
प्रत्येक पांच साल में चुनाव करवा लेने तक महदूद हो गया है.फिल्म के शुरू में अफसर
बने संजय मिश्र का बहुत मानीखेज संवाद है कि ‘भले संसद में चुनकर गुंडे पहुँचते
रहें लेकिन हम चुनाव में गुंडागर्दी नहीं होने देंगे..’भारतीय लोकतंत्र के वोटिंग
के ढकोसले की पर्त तब और दरक जाती है जब वोट करने आये हुए आदिवासियों को पता ही
नहीं होता किसे और कैसे वोट करें..लोकतंत्र का यह महापर्व तब और विद्रूप हो उठता
है जब एक पत्रकार एक आदिवासी से पूछता है ‘आपको लगता है कुछ बदलेगा..’आदिवासी जवाब
देता है ‘कुछ नहीं बदलेगा..’
फिल्म के इन तमाम दृश्यों
से गुजरते हुए यह महसूस होता है कि दृश्य के दरमियान ये जो अदृश्य का पर्दा खिंचा
हुआ है इसकी वजह क्या है और हम तब एक दृश्य देखते हैं जहाँ हमें एक खदान दिखती है
और वहां से ट्रक कुछ ढोकर ले जा रहें हैं.ये जो ख़बरें छत्तीसगढ़, झारखण्ड से किसी
एक्टिविस्ट को गिरफ्तार करने, किसी आदिवासी महिला के ऊपर पुलिसिया अत्याचार, सुरक्षा
कर्मियों के मारे जाने की आती हैं और जिन्हें हम कई सौ किलोमीटर दूर बैठे हुए
एकरेखीय ढंग से पढ़कर भूल जाते हैं तब दरअसल हम वहां के हालातों की पेचीदगियों को
नजरअंदाज कर रहे होते हैं.हम वेदांता जैसे पूँजी के सिंडीकेटों और सरकार के गठजोड़,
ऐसे गठजोड़ों के खिलाफ आदिवासियों के संगठित प्रतिरोधों को कुचलने के लिए मिलट्री
और पुलिस बलों के दमन, राज्य द्वारा आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लूट के खिलाफ
चलने वाले आंदोलनों को कुचलने के लिए ‘सलवा-जुडूम’ जैसे आदिवासियों के बीच से ही बनाये गए हथियार बंद दस्ते भूल जाते हैं..हम भूल
जाते हैं कि कैसे इन जंगलों और वहां मौजूद खनिज संपदाओं की लूट के लिए आदिवासियों
के हजारों सालों के कानूनों, उनकी संस्कृति, उनके खानपान, उनके पहनावों,उनके
रहन-सहन के तरीकों को पूँजी की संस्कृति पैसे का लालच देकर संदूषित कर रही
है..फिल्म में हम देखते हैं कि आदिवासियों के बीच से ही कुछ नौजवानों को बंदूकें
पकड़ा दी गई हैं और वे सब वहां के मिलट्री वालों के इशारों पर काम कर रहे हैं..वे
जमीनों के मोलभाव से लेकर हथियारों के मोलभाव में कमीशन चाहते हैं..हम फिल्म में
देखते हैं कि कैसे इन आदिवासियों के दूर-दराज के इलाकों में भी चिट-फंड जैसे फ्रॉड
करने वाले धंधे आदिवासी नौजवानों को बाइक,टच स्क्रीन स्मार्टफोन के सपने दिखाकर उन्हें
अपने जाल में जकड चुकी हैं.
ऊपर कहा गया है कि एक-एक चरित्र,एक-एक दृश्य
अपने साथ एक छुपी हुई सच्चाई छिपाए है..जैसा कि फिल्म में ‘मलको’, ‘न्यूटन’ को पांचवे
नंबर के तास के पत्ते का अर्थ बताती है और बंद मुट्ठी की एक ऊँगली खोलकर दिमाग की
तरफ इशारा करती है जिससे ‘न्यूटन’ को फर्जी फायरिंग से उसे गुमराह करने की साजिश
समझ आती है..दरअसल यहीं पूरी फिल्म को समझने का सूत्र भी छिपा हुआ है..आमतौर पर
सस्पेंस फिल्मों में दर्शकों को फिल्म के अंत में अदृश्य दृश्यों के पैचेज दिखाकर फिल्म
को समझने में मदद दे दी जाती है लेकिन ‘न्यूटन’ उन अदृश्य सिरों को नहीं पकड़ाती
बल्कि दर्शकों को खुद ही अपने दिमाग से उन्हें पकड़ना और समझना है.बूथ में कोई वोट
डालने नहीं आ रहा है ‘लोकनाथ’(रघुवीर यादव) बातूनी हैं..वे बोल रहे हैं और बांकी
सदस्य उनकी बातें सुन मुस्करा रहे हैं..वे बता रहे हैं कि ‘यहीं से रावण ने सीता
का हरण किया था’..’रावण के पास पुष्पक विमान था’..’रावण विश्व का पहला पायलट
था..’इन संवादों से मिलाकर हम अपने प्रधान मंत्री की गणेश के सन्दर्भ में की गई
जेनेटिक सर्जरी सहित हाल ही में अब उपराष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू की दुर्गा भारत
की पहली रक्षामंत्री थीं जैसी बातों को याद कर सकते हैं..जिन पर सिर्फ मुस्कराया
ही जा सकता है.
‘न्यूटन’ स्थापित हो गए तथाकथित व्यावहारिक
मूल्यों और अनकहे ढंग से बना दिए गए नियमों के साथ-साथ व्यवस्था के अजीबो-गरीब
ढांचे को ह्यूमर के शिल्प में उनके काइयांपने व दारुणता को बारीकी से पकड़ती है.
नाबालिग लड़की से शादी के लिए इंकार करने पर ‘न्यूटन’ के पिता की नसीहत, बूथ-स्थल
पर श्रेणीक्रम में ऊपर-नीचे के अफसरों का एक साथ रेबेन पहनने,आत्मा सिंह और न्यूटन
के बीच आपसी तकरार,आत्मा सिंह का अपने परिवार के साथ मॉल में खरीददारी वाले
दृश्यों को याद किया जा सकता है.
इस फिल्म के अभिनेताओं के अभिनय, स्वप्निल
सोनावने की सिनेमैटोग्राफी के साथ जो चीज प्रभावित करती है वह है फिल्म का
बैकग्राउंड स्कोर,बहुत दिनों बाद दृश्यों के साथ मेल खाता बैकग्राउंड स्कोर जिसमें
जंगलों के सुनसान में पसरे संदिग्ध खतरे को बहुत प्रभावशाली ढंग से ‘नरेन
चंदावरकर’ व ‘बेनेडिक्ट टेलर’ ने व्यक्त
किया है, सुनने को मिला है. इधर जिसतरह पत्रकारिता से लेकर सिनेमा तक प्रोपेगैंडिस्ट
हो चुका है जिसकी सारी कवायद कुछ निहित उद्देश्यों को पूरा करने तक सीमित है. मयंक
तिवारी और अमित वी मसुरकर की ‘न्यूटन’ ‘अम्बानी और चायवाली के साथ गिरने’ के
उदाहरण की उलटबांसी से ‘इमान के डंडे,बुद्धि के बल्लम,अभय की गेती’ के सहारे जरुरी
मुद्दों पर ‘जुटे रहने’ का ‘डिस्ट्रेस सिगनल’ है जिसे समझना हम सबकी जिम्मेदारी
है.








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