गुलाबो सिताबो: कम बची रह गई जगहों और किरदारों की कहानी
शुजित सरकार और जूही चतुर्वेदी बॉलीवुड की उन जोड़ियों में से हैं जिनके काम का इंतजार ‘विकी डोनर’ के समय से रहता है. आज इस जोड़ी की एक और फ़िल्म ‘गुलाबो सिताबो’ प्राइम वीडियोज में रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म में इस जोड़ी ने अपने पुराने प्रतिमानों को ध्वस्त करते हुये नितांत नया प्रयोग करते हुये दर्शकों के समक्ष ख़ालिस पुराने लखनऊ के किरदारों और इस पुराने लखनऊ के परिवेश में अपनी स्वायत्तता के साथ पल रहे आज के दौर के किरदारों की कहानी कही है.
फ़िल्म ‘गुलाबो सिताबो’ किरदारों की कहानी है. यह उस मिर्ज़ा चुन्नन नवाब(अमिताभ बच्चन) नामक किरदार से दर्शकों को रुबरू कराती है जिसकी हैसियत कभी पुश्तैनी मालिकाने की नहीं रही लेकिन इस मालिकाने की चाहत उसे अपने से सत्रह साल बड़ी ‘बेगम’ से शादी करने को प्रेरित करती है. इसी मालिकाने के एहसास को ज़िंदा रखने के लिए ही वह हवेली में रहने वाले किराएदारों से किराए की वसूली के लिए तगादे करता है, किराया चुकता न करने की स्थिति में उनके बल्ब और सामानों को चुराकर व उन्हें बेचकर उसकी भरपाई करता है. वह हवेली को वहाँ रहने वाले किराएदारों द्वारा इस्तेमाल न करने देने के लिए पुरज़ोर कोशिश में लगा रहता है इसलिए वह बाथरूम और अन्य ख़ाली पड़ी जगहों को ताले लगाकर बंद करता जाता है. उसे मालिकाने की चाहत ने इस क़दर जकड़ रखा है कि वह नैतिक, मानवीय, संवेदना जैसे मूल्यों का विपरीतार्थक ही बना रहता है. उसके ख़ुद के जीवन की ट्रेजडी ही यही है कि वह जिस मालिकाने को पाने लिये ताज़िंदगी अतिरिक्त प्रयासों में लगा रहता है अंत में वह स्वयं हवेली से बेदख़ल कर दिया जाता है. मिर्ज़ा जो शायद इसी ख़्वाहिश में हवेली के साथ ही जर्जर होता चला गया कि एक दिन वह हवेली का मालिकाना हासिल कर लेगा. एकाध दृश्यों में देखा जा सकता है कि कुछ लाख रुपयों और मालिकाना हासिल करने की उत्तेजना में वह जब लड़खड़ाता है तो जैसे ध्वस्त होती जर्जर हवेली का ही रूपक बन जाता है. कब कोई बिल्डर हवेली को ध्वस्त करके वहाँ कोई बहुमंज़िला इमारत खड़ी कर दे इस बिल्डर युग में जो कि क़तई नामुमकिन बात नहीं है. उसकी पहुँच तमाम सरकारी दफ़्तरों तक है, वह पुश्तैनी मालिकों की मुँहमाँगी रक़म उनके मुँह पर मार सकता है.
ऐसे ही फ़िल्म में एक किरदार है ‘बेगम’ (फ़र्रुख ज़फ़र) का जो कि हवेली की पुश्तैनी मालिकिन है. बेगम ख़ानदानी हैं. मिर्ज़ा और बेगम का रिश्ता हवेली के पुल पर टिका है, बेगम को हवेली और अपने वास्तविक प्रेमी में से किसी एक को चुनना था, बेगम ने हवेली को चुना क्योंकि वहाँ उनका जन्म हुआ था. बहरहाल मिर्ज़ा और बेगम फ़िल्म में मालिकाने की चाहत और पुश्तैनी मालिक होने के बीच फ़र्क़ की दो कंडियाँ हैं. मिर्ज़ा बेगम के ख़ानदान वालों को अब भी स्वीकार्य नहीं है.
फ़िल्म का एक अन्य किरदार ‘बाँके’(आयुषमान) है, जिसे हिंदी के एक कवि की पंक्ति में कहा जाये तो वह ‘अपने पिता की अनुकृति है’ जिसने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं और प्रेम व सपनों की तिलांजलि देकर परिवार की ज़िम्मेदारियों के बोझ में दब गया है. बाँके का पूरा संघर्ष ही यही है कि कैसे सर के ऊपर की क्षत बचा ली जाये. याद नहीं पड़ता हिंदी फ़िल्मों में आटा चक्की में आटा पीसने वाला कोई नायक भी कभी हुआ है.
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि पुराने लखनऊ के परिवेश में आज के किरदार भी अपनी स्वायत्तता के साथ मौजूद हैं. ऐसा ही किरदार है गुड्डो (सृष्टि श्रीवास्तव) का. वह जर्जर हवेली में अपने भाई, माँ और छोटी बहनों के साथ कुछ और निम्न आयवर्ग वाले किराएदारों के परिवेश में रहती ज़रूर है लेकिन उसमें एक लड़की के बतौर वह जो भी निर्णय लेती है उन निर्णयों को लेकर उसमें कोई ग़िल्ट नहीं है. उलटे वह सामने वाले को इनसिक्योर महसूस करा देती है. यह किरदार आज के दौर की अधिकांश लड़कियों का प्रधान और मज़बूत चरित्र है जिसे हम रोज़मर्रा के जीवन से लेकर सोशल मीडिया में उनकी बेबाक़ अभिव्यक्तियों में देख सकते हैं.
फ़िल्म में कुछ और पूरक किरदार भी हैं मसलन ‘पांडेय जी’ ‘वक़ील’(विजेंद्र काला) ज्ञानेश शुक्ला(विजय राज) जो पूरी फ़िल्म में कहानी के महत्वपूर्ण सूत्र हैं.
इस मल्टीनेशनल संस्कृति के युग में जैसा कि कवि अलोक धन्वा ने अपनी एक कविता में इलाहाबाद, लखनऊ और पटना के बहुत कम बचे होने की बात की थी, सरकार और जूही जब भी साथ आते हैं तो वे इस बहुत कम बचे रह गए को ही हमारे सामने पेश करते हैं ,जिसे अब हेरिटेज प्रॉपर्टी के घेरों में क़ैद कर दिया गया है. रोज़मर्रा के जीवन की बहुत मामूली और प्रिय चीजें जो अब एंटीक स्टोरों में व्यापार के लिए सज़ा दी गई हैं. इसी प्रक्रिया में समाज के विभाजन, विघटन, मज़बूती, कमज़ोरी आदि लड़ियाँ भी अनायास ही जुड़ती चली जाती हैं.

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