मनमर्ज़ियाँ-प्रेम की भावनात्मक उलझनें


    ‘रेने मागरिटे’ की पेंटिंग है ‘द लवर्स’, जिसमें दो प्रेमी जोड़े चेहरे में कपड़ा डाले एक-दूसरे को चूम रहे हैं.इस पेंटिंग के बारे में अलग-अलग व्याख्याएँ हैं. कुछ ने इसे रेने की माँ की आत्महत्या से जोड़ा, किसी ने इसे दो प्रेमियों के बीच गहन निकटता लेकिन उतने ही एक-दूसरे से बिलकुल अलग व्यक्तियों के रूप में देखा. यहीं पर दो और कलाकृतियों का जिक्र कर देना जरुरी है, एक है ‘गुस्ताव क्लिम्ट’ की पेंटिंग ‘द किस’ और दूसरा है ‘अगस्ते रोडिन’ का स्कल्पचर (मूर्ति) ‘द किस’. रेने की पेंटिंग के बरक्स बाद की दो कलाकृतियों में दो प्रेमियों के बीच भावनाओं की कोमलता, मुलायमियत को बिलकुल स्पष्ट ढंग से देखा जा सकता है. मैंने इन कलाकृतियों का जिक्र इसलिए किया क्यों कि फिल्म मनमर्जियां प्रेम की ऐसी ही भावनात्मक जटिलताओं को व्यक्त करती है.
                                 


      अनुराग कश्यप की फिल्म ‘मनमर्जियां’ प्रेम के दो अलग-अलग स्वरूपों को दर्शकों के सामने रखती है. प्यार का एक स्वरुप जिसे फिल्म में ‘फ्यार’ कहा गया है विकी(विकी कौशल) और  रूमी(तापसी पन्नू) के बीच घटित होता है,जहाँ एक-दूसरे के लिए ज़ुनून है, पागलपन है,आसक्ति है, भावनाओं का तीव्र ज्वार है, लेकिन दोनों के बीच एक-दूसरे के सम्बन्ध में समझ का फ़र्क है, एक को दूसरे पर जितना भरोसा है, दूसरा उतना ही दिग्भ्रमित है और हर बार निर्णायक मौकों पर साथ छोड़ जाता है. प्यार का दूसरा स्वरुप रॉबी(अभिषेक बच्चन) और रूमी के बीच देखने को मिलता है, जहाँ सौम्यता है, साहचर्य की भावना है, शालीनता है, जहाँ दर्शक प्यार को पनपते हुए देखते हैं. लेकिन कोई भी सम्बन्ध जब बनता है तो वह तटस्थ नहीं होता, अपनी जटिलताओं के साथ आगे बढ़ता है, और  भारतीय समाज में जो खुद में भी तमाम जटिलताओं से अवगुंठित है वहाँ एक तटस्थ सम्बन्ध की तो परिकल्पना करना ही बेमानी है. यहाँ तटस्थता से तात्पर्य है एक जोड़े का किसी और के प्रति जवाबदेह न होना लेकिन जाति, समाज, रिश्तेदार, पड़ोसी जैसे कई स्तरों में बना दी गई जवाबदेही भारतीय सामंती समाज में एक प्रेमी जोड़ों को भावनात्मक संघर्षों के साथ-साथ सामाजिक संघर्षों से भी जूझना होता है.इसतरह भारतीय सामंती समाज में प्यार करना, अपना जीवन साथी खुद से चुनना दुनिया के किसी अन्य मुल्क की अपेक्षा दोहरे दबावों और संघर्षों से गुजरने जैसा है.
                            

   ‘रूमी’ जो अल्हड़ है, बिंदास है, साहसी है, जिद्दी है, मैनीपुलेटिव है एक दिन अपने घर वालों द्वारा अपने ही घर में विकी के साथ पकड़ ली जाती है. घर वाले रूमी के सामने समाज में नाम ख़राब होने का डर दिखाकर उससे विकी के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखते हैं.रूमी को विकी पर विश्वास है कि वह उसके घर शादी की बात करने आएगा लेकिन विकी नहीं आता, वह अभी शादी के लिए तैयार नहीं. रूमी अपने घर वालों से किये वादे के अनुसार किसी दूसरे लड़के से शादी के लिए हाँ कह देती है.यहाँ फिल्म में रॉबी का प्रवेश होता है और इस तरह रॉबी, रूमी और विकी के बीच रिश्तों में पैदा हुई जटिलता को हम प्रेम संबंधों की जटिलता के रूप में गहराई से महसूस करते हैं. विकी की गैरजिम्मेदाराना रवैये से आजिज़ आकर रूमी, रॉबी से शादी तो कर लेती है. लेकिन विकी और रूमी का एक-दूसरे से लगाव कम नहीं होता है और वे मिलना जारी रखते हैं. यहाँ फिल्म ‘गुमराह’ याद आती है जिसका एक गाना बहुत प्रसिद्ध है ‘चलो एक बार फिर से....’ लेकिन यह फिल्म स्त्री की चारित्रिक शुद्धता के सन्देश तक सिमट कर रह जाती है, वहां शादी-शुदा होकर पर-पुरुष से मिलने का राज खुल जाने से होने वाली बदनामी का डर है लेकिन कोई जटिलता उभर कर सामने नहीं आ पाती. कुछ समीक्षाओं में इसकी तुलना संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ से की गई है, अपने पूर्व प्रेमी की जगह अंत में अपने पति की भलमनसाहत को चुनने के कोण से इसकी तुलना हो सकती है लेकिन प्रेम की भावनात्मक जटिलताओं के मसले पर ‘हम दिल दे चुके सनम’ भी खामोश है.
       हम देखते हैं की कैसे दो पूर्व प्रेमियों का अहम् उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं होने देता. विकी के  अहम् को चोट लगती है की रूमी ने उसकी जगह किसी और को चुन लिया, रूमी के अहम् को चोट लगती है कि उसके कहने पर भी वह उसके घर शादी की बात करने नहीं आया. बल्कि वह तो भागने के लिए बैग लेकर सड़क में तैयार खड़ी थी,उस दिन भी उसे अकेला छोड़ दिया गया.हलांकि विकी अपने पिता की सलाह से उस दिन लड़की को मुक्त कर रहा था या उसे अपनी गैरजिम्मेदारियां ही इतनी प्यारी थीं यह ठीक-ठीक स्पष्ट नहीं हो पाता. इस अहम् संतुष्टि के लिए शुरू होता प्रेमियों का एक शाश्वत खेल और वह है एक-दूसरे को इर्ष्या महसूस कराना.रूमी मैसेज भेजती है ..’स्लेप्ट विद हिम’, विकी अपने दोस्त की गर्लफ्रेंड के साथ वीडियो बनाकर रूमी को भेजता है. यहाँ फिल्म ‘नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’ को याद किया जा सकता है, जहाँ एमा(नताली पोर्टमैन), दो एन्य लड़कियों के साथ एडम(एश्टन कचर) को देखकर इर्ष्या महसूस करती है हलांकि उनके बीच हुकअप(सिर्फ सेक्स) से शुरू हुआ रिश्ता प्यार में बदल जाता है लेकिन एमा, एडम को दूसरे संबंधों में देखकर इर्ष्या तो महसूस करती है लेकिन प्रतिबद्ध रिश्ते में जाने से लगातार इनकार करती है. इसतरह इस फिल्म में प्रेम की जटिलता का एक दूसरा पहलू है जिस पर अलग से बात की जा सकती है. लेकिन मनमर्जियां का त्रिकोणीय प्रेम दर्शकों के सामने इर्ष्या के पहलू के साथ-साथ प्रेम के लिए चलने वाली प्रतिद्वंदिता, प्रेम हासिल कर लेने की अभिलाषा और सही-गलत के बीच के द्वंद्व, अलग होने के दर्द जैसे पहलुओं के रूप में सामने आता है.यहाँ यह ध्यान रखना जरुरी है की जहाँ एक अपने प्रेम को ज़ाहिर करने में जितना ही मुखर है,मस्कुलिन है, दूसरा उतना ही अंतर्मुखी और नर्डी, रूमी के अनुसार ‘रामजी टाइप’.
                          

   किसी भी रिश्ते में रहते हुए एक क्षण आता  है जब रिश्ते की गहराई और गंभीरता दोनों की परख होती है. वह क्षण रिश्तों की बनावटी और झूठी परतों को खुरच कर उसकी सचाई दिखा देता है.शादी के बाद रूमी, विकी से मिलने जाती है, शारीरिक सम्बन्ध के बाद शादीशुदा रूमी को धोखा देने का गिल्ट महसूस होता है.वह विकी से कहती है ‘घर कैसे जाउंगी?’, विकी यह बात किसी से न बताने की बात करता है. फिल्म में यही वह निर्णायक क्षण है जहाँ रूमी एक गलत रिश्ते में होने का अहसास करती है,रिश्ते में महज एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में. फिल्म ‘व्हाट इफ’ याद आती है जो एक सही और ग़लत रिश्ते में होने की कहानी है. यहाँ भी वह क्षण मौजूद है जब ‘चैन्ट्री’ (ज़ोए कज़ान) यह महसूस करती है कि ‘बेन’ (राफ स्पल) के साथ रिश्ते में वह किसी निर्णय में मौजूद नहीं है.सभी निर्णय सिर्फ ‘बेन’ के हैं. मनमर्जियां देखते हुए सवाल उठता है यदि विकी से पहले रूमी की जिंदगी में रॉबी आया होता तो? लेकिन रिश्तों की यही तो खासियत होती है की इसे पहले या बाद की बाइनरी में नहीं समझा जा सकता है. लिबरेशन की भावना, जकड़न, रिश्ते में एक-दूसरे को जानने की उत्कंठा, बेपरवाही कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो किसी रिश्ते की कृत्रिमता और वास्तविकता को तय करते हैं. फिल्म में रॉबी और रूमी के बीच एक-दूसरे की पसंद-नापसंद जानने की कोशिश में होने वाली बातचीत याद की जा सकती है. वहीँ हम फिल्म में देखते हैं कि विकी के साथ रूमी का रिश्ता पागलपन वाला तो है लेकिन वहां जकड़न भी साफ़ देखी जा सकती है और एक समय ऐसा आता है जब रूमी उस जकड़न को बहुत गहरे महसूस करने लगती है. उसे समझ आ जाता है कि जैसे वह कुछ चीजों में मैनिपुलेटिव है ठीक वैसे ही विकी भी उसे सेक्सुअली मैनिपुलेट कर रहा है. विकी, रूमी से पूछता है कि ‘जब रॉबी तुम्हे प्यार करता है तब आँखें बंद करके तुम मुझे याद करती हो या आँखें खोलकर उसका चेहरा देखती हो..’
                                    

    यहाँ एक बात बहुत बारीकी से रेखांकित करने की जरुरत है और वह है ‘सेक्सुअलिटी’. पितृसत्तात्मक समाज में प्रेम भी सेक्सुअल पॉलिटिक्स से परे नहीं है. एक स्त्री के लिए चलने वाली दो पुरुषों के बीच प्रतिद्वंदिता और कुछ नहीं बस अपनी-अपनी पौरुषता को संतुष्ट करने की चालबाजियां हैं. एक स्त्री जिसे बकौल केट मिलेट ‘अपने शोषित होने का अहसास तक नहीं होता,कनडिसनिंग का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता.’ यहाँ यह बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं रह जाता कि कौन कितना मैसकुलिन है और कौन कितना चिवलरस(उदार).फिल्म के एक दृश्य में विकी, रूमी से कहता है ‘जितना प्यार मैं तुम्हे कर सकता हूँ, कोई नहीं कर सकता..’ एक दूसरे दृश्य में हम देखते हैं कि रॉबी, रूमी को विकी से मिलते हुए देख लेता है जिसके बाद दर्शक उसे फिल्म में पहली बार ‘राम जी’ टाइप के कैरेक्टर से बाहर निकलते हुए देखते हैं और वह रूमी और विकी के संबंधों को ‘सिक’ कहता है.
       इस पितृसत्तात्मक समाज में में रूमी को एक गैर जिम्मेदाराना रिश्ते की जगह भविष्य की सुरक्षा चुनना है.लेकिन यह सुरक्षा, यह चिवलरसनेस रूमी को अपनी कानूनी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता खोकर ही हासिल हो सकती है जिसको कभी केट मिलेट ने अपनी किताब ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में व्यक्त किया था. और यहीं हम फिल्म के अंत को समझ सकते हैं. यहाँ यह भ्रम हो सकता है कि रॉबी, रूमी को आज़ाद कर रहा है लेकिन सारा माजरा तब समझ आ जाता है जब रूमी, रॉबी को फेसबुक में फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजती है, प्रोफाईल खुलने पर हम देखते हैं की रूमी ने अब अपनी प्रोफाइल में रॉबी के साथ शादी की तस्वीरें लगा दिया है. रूमी चाहती तो वह किसी रिश्ते में जाने की जगह अपनी व्यक्तिगत आज़ादी चुन सकती थी जैसे फिल्म ‘क्लोजर’ में ‘एलिस/जेन’(नताली पोर्टमैन) अपनी व्यक्तिगत आज़ादी चुनती है लेकिन शायद सिगरेट, शराब पीने और प्रेम में मुखर होने के बावजूद रूमी के पास ‘एलिस/जेन’ की तरह पितृसत्तात्मक समाज में अपनी ‘कंडिशनिंग’ की चेतना उसके पास बिलकुल नहीं है.यही इस फिल्म की आलोचना भी हो सकती है. अनुराग की फिल्म ‘देव डी’ की तरह ‘मनमर्जियां’ भी एक स्त्री दृष्टिकोण से नहीं बल्कि प्रेम का भ्रम पैदा करते हुए पुरुष दृष्टिकोण से समाप्त होती है.
                                    

                चूँकि फिल्म अनुराग की है तो ज़ाहिर है हमें फिल्म की प्रस्तुतिकरण और दृश्य संयोजनों में कुछ प्रयोग देखने को भी मिलते हैं. पहले कोई दृश्य दिखाना उस दृश्य के पीछे घटित हुयी कहानी बाद में दिखाना.दृश्य संयोजन में ऐसा प्रयोग मुझे हिंदी फिल्मों में याद नहीं आ रहा बल्कि ऊपर जिक्र की जा चुकी फिल्म ‘क्लोजर’ में इस तरह के दृश्य संयोजनों को देखा जा सकता है. इसीतरह दृश्यों के बीच-बीच में दो लड़कियों का डांस करना भी एक नया प्रयोग है.फिल्म की कहानी अमृतसर आधारित है, जैसे हमने अनुराग की अन्य फिल्मों में स्थानीय जगहों को विश्वसनीय ढंग से देखा है इस फिल्म में भी अमृतसर काफी जीवंत है. इधर विकी कौशल और तापसी पन्नू दोनों ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने अभिनय में एक अलग रेंज हासिल की है. अभिषेक बच्चन ने इस फिल्म में अपनी पहले की फिल्मों की अपेक्षा अभिनय के दूसरे छोर पर खड़े हुए दीखते हैं. अमित त्रिवेदी द्वारा तैयार किया गया फिल्म का संगीत और ‘शैली’ के गीतों ने इस साल के सबसे बेहतरीन संगीत और गीतों का दर्जा पा लिया है जिसमें शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है.     

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