अन इन्सिग्निफिकेंट मैन:निकट अतीत का इतिवृत्त नहीं है सिर्फ

जब फ़िल्म कटियाबाजआई थी तो बहुत लोगों ने विश्वास नहीं किया था कि ऐसे भी कोई फ़िल्म बनाई जा सकती है जहाँ चलती फिरती दुनिया ही स्क्रिप्ट है ..सड़कों पर इधर-उधर दौड़ भाग में लगे लोग ही फ़िल्म के पात्र हैं ..फ़िल्म में सारी संवेदनाएँ ,तनाव हो सकते हैं जो वेल स्क्रिप्टेड और मंझे हुये अभिनेता,अभिनेत्रियों के अभिनय वाले सिनेमा में हमें देखने को मिलते हैं..इस बात को ‘An Insignificant Man’ ने किंचित एक बड़ा आयाम लेते हुये स्थापित कर दिया है कि हां ऐसा सिनेमा भी बनाया जा सकता है..

इस फ़िल्म को न सिर्फ़ एक राजनीतिक पार्टी उसके नेताओं के बनने,उनके आपसी मतभेदों,उनके उन तमाम लोगों के साथ सम्बंधों, उन लोगों के विश्वासों को समझने के लिए देखना चाहिए ..हालाँकि यह बिलकुल निकट अतीत की ही बात है जो अभी हम सभी के ज़ेहन में बासी नहीं हुई..बल्कि उन एहसासों ,संवेदनाओं,विचारों,कुटिलताओं,प्रहसनों, अहमकपना को बिलकुल उनके आदिम रूपों में देखने के अनुभवों के लिए भी देखना चाहिये..
निश्चित रूप से फ़िल्म में इन सब पहलुओं को उभारने में फ़िल्म की एडिटिंग कमाल करती है ..मैं ठीक उस वक़्त CSDS कॉन्फ़ेरेंस रूम में पहुँचा जब फ़िल्म का वह हिस्सा चल रहा था जब अन्ना आंदोलनके दौरान अरविंद केजरीवाल जंतर-मंतर में लोकपाल के लिए अनशन पर थे और उनका शरीर लगातार अनशन से आशक्त हो चुका था था..हम देखते हैं कि एक क्रशकाय शरीर अपने सामने खड़ी हज़ारों समर्थकों की भीड़ को अभिवादन के लिए खड़ा होता है तो हजारों की तादाद में लोगों के आह्लादकारी नारों से दिया गया प्रत्युत्तर अरविंद केजरीवाल को उस विराट नायक में बदल देता है जो लाखों-करोड़ों के भ्रष्टाचार मुक्ति के सपने को आवाज दे रहा है..हालाँकि फ़िल्म आगे बढ़ती है जो आंदोलन से आगे पार्टी फ़ॉर्मेशन और चुनावों में पार्टिशन तक के दृश्यों को समोय हुये है और इन दृश्यों से बीच-बीच में पैदा होती आयरनी से दर्शक वबस्ता होते चलते हैं..वही अरविंद केजरीवाल जो किसी दृश्य में विराट नायक मालूम होते हैं अपने त्याग का पार्टी में विशेष निर्णायक का प्रतिफल चाहने वाले साधारण व्यक्ति मालूम होते हैं जिसमें सहज महत्वाकांक्षा भी है. यहाँ वो कार्यकर्ता भी पवित्र नहीं मालूम होते जिन्हें निरापद समझ लिया जाये..कैमरा उनके चेहरे के भावों को पकड़कर उन्हें भी प्रश्नों के दायरे में खींच लाता है..
फ़िल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ते हैं मसलन आप नेता संतोष कोली की मौत के बाद शोक शभा में अरविन्द का रुँधे गले से दिया हुआ वक्तव्य, कई ऐसे दृश्य हैं जो पलिटिकल थ्रिलर सिनेमा की तरह भयानक तनावों से भर देने वाले हैं मसलन आप कार्यकर्त्ताओं और अन्य पार्टियों के कार्यकर्त्ताओं के आमने-सामने आने, आप नेताओं को जान से मारने की दी जाने वाली धमकियों और आप नेताओं के बाँट चुके धडों की आपसी मीटिंगों के दृश्य एक अप्रत्याशित अनहोनी के तनावों से भर देते हैं..यह फिल्म तथाकथित लोकप्रिय भारतीय राजनीति के दृश्य  दिखाकर उसकी वैचारिक विपन्नता को भी उधेड़ती है जैसे एक दृश्य में शीला दीक्षित का दलेर मेहँदी के साथ प्रचार सी.डी जारी करती हुई दिखाई देती हैं.


      अन्ना आन्दोलन ,आप का दिल्ली की सत्ता में आना, आपसी मतभेदों के बाद योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण का आप से निकाला जाना..कुछ समय के राजनीतिक अनुभवों के बाद शुरू में जिन राजनीतिक हथकंडों  से बचने की कोशिश की गई थी कुछ उन्हीं हथकंडों का सहारा लेकर वर्चस्व हासिल करना इन सभी बातों को ज्यादा अरसा बीते हुए नहीं हुए लेकिन फिल्म ‘अन इन्सिग्निफ़िकैन्ट मैन’ सिर्फ इन सब घटनाओं का इतिवृत्त बनने से बचती है यही इसकी सबसे बड़ी है. फिल्म के निर्देशक खुशबू रांका, विनय शुक्ला और इस फिल्म के एडिटर्स मनन भट्ट और अभिनव त्यागी ने एक तरह से वह ‘टाइम मशीन’ रची है जिससे जाहिर समय-काल तो नहीं बदला जा सकता लेकिन मूल्यों के स्तर पर उतरकर आत्मालोचन की नियत हो तो प्रेरित करने की ताकत रखती है.    

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