बायोपिक या नीरज पाण्डेय की फेयरी टेल; एम.एस. धोनी :द अनटोल्ड स्टोरी
एक बेहतरीन बायोपिक किसे कह सकते हैं?मैं जब एम.एस धोनी:द अनटोल्ड स्टोरी देख रहा था तब यही सवाल मेरे दिमाग़ में था क्यों कि यह फ़िल्म देखने का एकमात्र मक़सद यह था कि यह फ़िल्म एक जीवित क्रिकेट खिलाड़ी के जीवन पर है और इसे उसकी बायोपिक कहा जा रहा था और इसे मैं इसलिए देखने नहीं गया था कि यह धोनी पर बनी फ़िल्म है और मैं धोनी और क्रिकेट का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ.मैंने यह फ़िल्म विशुद्ध रूप से अपनी सिनेमा के प्रति रुचि के चलते देखी और इस फ़िल्म को देखते हुये मेरे सामने मेरे द्वारा पहली बार समीक्षा की गई बायोपिक फ़िल्म 'पान सिंह तोमर' से लेकर 'अ ब्यूटिफ़ुल माइंड', 'सिंडलर्स लिस्ट' सहित दुनिया की अन्य दूसरी फ़िल्में थीं.
मैं यह बिलकुल समझना चाहता हूँ कि नीरज पांडेय ने 'एम.एस. धोनी' बनाते हुये धोनी के पैदा होने से लेकर लोगों द्वारा धोनी के बारे में जानी हुई बातों को क्यों अपनी इस बायोपिक फ़िल्म में शामिल किया होगा जिसमें पर्याप्त एडिटिंग की गुंजाइश थी या फ़िल्म के स्क्रीन प्ले में वे पहलू न होते तो भी धोनी के बारे में जो कहा जाना है उसमें शायद कोई फ़र्क़ पड़ता अलबत्ता कुछ ग़ैरज़रूरी विषयों को शामिल करने से फ़िल्म बेवजह लम्बी खिंचती है मसलन धोनी के एक स्टार क्रिकेटर बनने के बाद विज्ञापन करने वाले दृश्य, धोनी के पैदा होने से लेकर बचपन तक के ज़बर्दस्ती कल्पना से बनाये हुये दृश्य. यह देखना बिलकुल अविश्वसनीय है कि एक छः- सात साल के बच्चे द्वारा अपने पिता को सर्दियों के दिन में खेल के मैदान में पानी डालते देखते हुए द्रवित होकर कुछ बनने की मन ही मन में सोच लेने वाले दृश्य बिलकुल बनावटी प्रतीत होते हैं.
एक बार फिर वापस 'बायोपिक' कैसी हो, वहाँ चलते हैं; क्या ऐसी कि पान सिंह धोनी के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ जिसके जेंडर के बारे में नर्स और डॉक्टर अलग-अलग सूचनाएँ देते हैं, वह कुछ बड़ा हुआ, स्कूल जाने लगा और फ़ुट्बॉल में उसकी रुचि थी लेकिन एक दिन एक क्रिकेट के कोच ने उसमें एक बेहतरीन विकेट कीपर देखा और उसको क्रिकेट खेलने के लिये कन्विन्स किया, आज जो सबके सामने है वही महेंद्र सिंह धोनी है.या फिर कहानी के कुछ ऐसी बुनावट की उम्मीद थी कि जिसके बारे में कहानी कही जानी है उसकी ज़िंदिगी के टर्निंगपॉंइंट्स क्या हैं? अलग-अलग जिंदगियों पर बनने वाली बायोपिक्स का तरीक़ा अलग-अलग हो सकता है, हो सकता है हमें किसी की कथा कहते हुये उसके ज़िन्दगी के सूत्रों को समझने के लिए बचपन से लेकर किशोरावस्था तक की जानकारी लेना ज़रूरी हो, लेकिन क्या किसी जीवित प्राणी जिसके बारे में समकालीन लोग भलीभाँति वाक़िफ़ हों उसके जीवन कथा का प्लॉट भी ठीक ऐसा ही होगा? एम.एस. धोनी को देखें तो फ़िल्म तभी ख़त्म हो जाती है जब फ़िल्म के अनुसार धोनी प्लेन में एक लड़की से मिलता है और वह उसके अगले मैच में बेहतर होगा ऐसा विश्वास दिखाती है,और धोनी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अगले मैच में अपना पहला शतक बनाता है, धोनी की शेष उपलब्धियाँ फिल्म के अंत में पर्दे पर पढ़ी भी जा सकती थीं जिनसे क्रिकेट देखने वाला दर्शक भलीभाँति वाक़िफ़ है.
कहना होगा यहीं फ़िल्म दो स्तरों में विभक्त हो जाती है,एक स्तर पर वह विशुद्ध क्रिकेट हो जाती है जो कि फ़िल्म का व्यावसायिक पहलू है, इस बात की ताईद फ़िल्म की पहले दिन की कमाई से बख़ूबी हो जाता है. दूसरे स्तर पर यह फ़िल्म उस बच्चे की हो जाती है जिसका पिता आम मध्यमवर्गीय पिताओं की तरह उसे न पढ़ने लिये डाँटता है, उस माँ की हो जाती है जो अपने बच्चे के हर जुर्म की सज़ा उसके पिता से माफ़ करवा लेती है,उस बहन की हो जाती है जो अपने भाई की सबसे अच्छी दोस्त और शुभचिंतक है, उस कोच की हो जाती है जो एक लड़के को अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में बड़ा करते हुये टीवी स्क्रीन के सामने बैठे हुये देखकर भावुक क्षणों में अपनी क्षाती में हथेली मारते हुये अपनी पत्नी से कहना चाहता है कि क्रिकेट के लिये यह लड़का मेरी खोज है, उस पत्नी की हो जाती है जिसका पति खेल के मैदान में जाने लिये इतना उत्सुक होता है कि वह मछली वाले से मोल-भाव भी नहीं कर पाती, टीवी में क्रिकेट देखने के दौरान वह अपने पति को जिन नजरों से देखती है वे आँखें बॉलीवुड में रेयर हैं,उस संतोष की हो जाती है जो अपनी प्रेमिका को देखकर हेलिकॉप्टर शॉट लगाकर गेंद उसकी बॉलकनी में पहुँचा देता है, उस क्रिकेट के शौक़ीन सरदार की हो जाती है जो धोनी को इसलिए सफल देखना चाहता है कि उसके साथ उसे एहसास हो कि उसके साथ उसने भी थोड़ी सी क्रिकेट खेल ली, उस अधिकारी की हो जाती है जो एक सफल हो गए खिलाड़ी से उसके प्रति कभी बरती गई दुर्भावनाओं के बारे में कन्फेस कर रहा है और कभी कुछ दिल में न रखने की विनती करता है, उस रेलवे के अधिकारी की हो जाती है जिसे प्रतिभा की पहचान करना और उसके टूटने के क्षणों में उसे संभालना आता है, रेलवे में ही टीटी की जॉब कर रहे उस 'भैया' की तरह हो जाती है जो एक फाइव स्टार होटल में सहमा हुआ सा आता हैऔर 'धोनी' से अपनी अटेंडर लड़की के कपडे छोटे होने की शिकायत करता है.
फिल्म अपने इसी टेम्परामेंट में आगे बढती तो शायद हिंदी फिल्मों की लिस्ट में एक और बेहतरीन बायोपिक जुड़ सकती थी लेकिन व्यावसायिक दबावों के चलते जिस तरह फ़िल्मी तत्वों को का सहारा लिया गया है वह फिल्म को अविश्वसनीय बनाती है. मसलन फिल्म में 'धोनी' को बचपन से उठाकर किशोर 'धोनी' को सीधे क्रिकेट के टूर्नामेंट में लाकर खड़ा कर दिया जाता है जहाँ वह प्रत्येक बॉल पर सिक्स मार रहा है, और एक लड़का बाज़ार से लेकर स्कूल तक कहते हुए घूम रहा है कि 'माही मार रहा है.' 'माही को मारते हुए देखने के लिए पूरा स्कूल और बाज़ार से लोग आकर इकट्ठे हो जाते हैं. ऐसे ही फिल्म में दोनों अभिनेत्रियों दिशा पटानी व किआरा आडवाणी की इस फिल्म में कोई खास जगह नहीं है. एक का बार-बार यह पूंछना की 'हमारे पास बहुत समय है न' अजीब लगता है. किआरा का धोनी की पत्नी साक्षी के रूप में चित्रण असल कहानी से अंतर किया गया है. यह सर्वविदित है कि साक्षी, धोनी की बचपन की दोस्त थीं जो बाद में शादी के बंधन में बंध गए लेकिन शायद यह अंतर भी फ़िल्मी तत्वों के लिए स्पेस बनाने के लिए किया गया होगा.
'एम.एस. धोनी:द अनटोल्ड स्टोरी' के हीरो पूरी तरह से 'महेंद्र सिंह धोनी' हैं. फिल्म देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि यह हमारे देश में क्रिकेट और एक बेहद सफल क्रिकेटर का क्रेज है कि अभिनेता के हर मूव में हम धोनी को देखते हैं या बतौर अभिनेता 'सुशांत सिंह राजपूत' का कमाल है कि वे इस कदर धोनी के चरित्र को परदे में उतारा है कि दर्शक भूल जाते हैं कि वे किसी अभिनेता को अभिनय करते हुए देख रहे हैं.
नीरज पाण्डेय फिल्म में सबकुछ कहने और कहानी को फेयरी टेल की तरह कहने का मोह छोड़ पाते तो शायद यह एक बेहतर बायोपिक होती.नीरज फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर खासा प्रभावी होता है. इस फिल्म में भी संजोय चौधरी ने प्रभावी बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया है. अमान मलिक के तैयार किये संगीत में एक गाना 'कौन तुझे यूँ प्यार करेगा' लोगों की जुबां पर है.






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